वैदिकस्त्वन सूर, तुलसी, मीरा आदि के भजन स्तुति आरती एवं कीर्तन का परिवर्धित संकलन (१०६१)

 

संकलनकर्ता

स्व. श्री श्यामलालजी तापड़िया

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Bin Kaju Aaj Maharaj Laj Gai Meri

द्रोपदी का विलाप बिन काज आज महाराज लाज गई मेरी दुख हरो द्वारिकानाथ शरण मैं तेरी दुःशासन वंश कठोर, महा दुखदाई खैंचत वह मेरो चीर

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Jay Jay Jag Janani Devi

पार्वती वन्दना जय जय जग-जननि देवि, सुर-नर-मुनि-असुर-सेवी भुक्ति-मुक्ति-दायिनि, भय-हरणि कालिका मंगल-मुद-सिद्धि-सदनि, पर्व शर्वरीश-वदनि ताप-तिमिर-तरुण-तरणि-किरण-पालिका वर्म-चर्म कर कृपाण, शूल-शेल धनुष बाण धरणि दलनि दानव दल रण

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Nirbal Ke Pran Pukar Rahe Jagdish Hare

जगदीश स्तवननिर्बल के प्राण पुकार रहे, जगदीश हरे जगदीश हरेसाँसों के स्वर झंकार रहे, जगदीश हरे जगदीश हरेआकाश हिमालय सागर में, पृथ्वी पाताल चराचर मेंये

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Kishori Tere Charanan Ki Raj Pau

श्री श्री राधा महात्म्य किशोरी तेरे चरणन की रज पाऊँ बैठि रहौं कुंजन की कोने, श्याम राधिका गाऊँ जो रज शिव सनकादिक लोचन, सो रज

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सम्मति पत्र -