Mhari Sudh Kripa Kar Lijo

शरणागति म्हारी सुध किरपा कर लीजो पल पल ऊभी पंथ निहारूँ, दरसण म्हाने दीजो मैं तो हूँ बहु ओगुणवाली, औगुण सब हर लीजो मैं दासी थारे चरण-कँवल की, मिल बिछड़न मत कीजो ‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणाँ में लीजो

Mhare Ghar Aao Pritam Pyara

आओ प्रीतम म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा, जग तुम बिन लागे खारा तन-मन धन सब भेंट धरूँगी, भजन करूँगी तुम्हारा तुम गुणवंत सुसाहिब कहिये, मोमें औगुण सारा मैं निगुणी कछु गुण नहिं जानूँ, ये सब बगसण हारा ‘मीराँ’ कहे प्रभु कब रे मिलोगे, तुम बिन नैण दुखारा

Mhare Janam Maran Ra Sathi

म्हारा साथी म्हारे जनम-मरण रा साथी, थाँने नहिं बिसरूँ दिन राती थाँ देख्याँ बिन कल न पड़त है, जाणत मोरी छाती ऊँची चढ़-चढ़ पंथ निहारूँ, रोय-रोय अँखिया राती यो संसार सकल जग झूँठो, झूँठा कुल रा न्याती दोउ कर जोड्याँ अरज करूँ छू, सुणल्यो म्हारी बाती यो मन मेरो बड़ो हरामी, ज्यूँ मदमातो हाथी सत्गुरू […]

Ya Braj Me Kachu Dekho Ri Tona

मुग्धा या वृज में कछु देखोरी टोना ले मटुकी गिर चली गुजरिया, आय मिले बाबा नंद को छोना दधि की पांग बिसरि गई प्यारी, लीजो रीं कोई श्याम सलौना बृन्दावन की कुंज गलिन में, आँख लगायो री मन-मोहना ‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, सुन्दर श्याम सुघर रस लोना

Rana Ji Ab Na Rahungi Tori Hatki

वैराग्य राणाजी! अब न रहूँगी तोरी हटकी साधु-संग मोहि प्यारा लागै, लाज गई घूँघट की पीहर मेड़ता छोड्यो अपनो, सुरत निरत दोउ चटकी सतगुरु मुकर दिखाया घट का, नाचुँगी दे दे चुटकी महल किला कुछ मोहि न चहिये, सारी रेसम-पट की भई दिवानी ‘मीराँ’ डोलै, केस-लटा सब छिटकी

Rana Jimhe To Govind Ka Gun Gasyan

भक्ति भाव राणाजी! म्हे तो गोविन्द का गुण गास्याँ चरणामृत को नेम हमारे, नित उठ दरसण जास्याँ हरि मंदिर में निरत करास्याँ, घूँघरिया धमकास्याँ राम नाम का झाँझ चलास्याँ, भव सागर तर जास्याँ यह संसार बाड़ का काँटा, सो संगत नहिं करस्याँ ‘मीराँ’ कहे प्रभु गिरिधर नागर, निरख परख गुण गास्याँ

Rana Ji Ruthe To Mharo Kai Karsi

गोविंद का गान राणाजी रूठे तो म्हारो काई करसी, मैं तो गोविन्द का गुण गास्याँ राणाजी भले ही वाँको देश रखासी, मैं तो हरि रूठ्याँ कठे जास्याँ लोक लाज की काँण न राखाँ मैं तो हरि-कीर्तन करास्याँ हरि-मंदिर में निरत करस्याँ, मैं तो घुँघरिया घमकास्याँ चरणामृत को नेम हमारो, मैं तो नित उठ दरसण जास्याँ […]

Ram Nam Ras Pije Manua

श्याम का रंग राम-नाम रस पीजै, मनुआ! राम-नाम रस पीजै ताज कुसंग, सत्संग बैठ नित, हरि-चर्चा सुन लीजै काम, क्रोध, मद लोभ, मोह कूँ बहा चित्त से दीजै ‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, ताहि के रंग में भीजै

Vinati Suno Shyam Meri

विरह व्यथा विनती सुनो श्याम मेरी, मैं तो हो गई थारी चेरी दरसन कारण भई बावरी, विरह व्यथा तन घेरी तेरे कारण जोगण हूँगी, करूँ नगर बिच फेरी अंग गले मृगछाला ओढूँ, यो तन भसम करूँगी ‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, वन-वन बीच फिरूँगी

Shri Radhe Rani De Daro Ni Bansuri Mori

बंसी राधे रानी दे डारो नी बाँसुरी मोरी जो बंशी में मोरे प्राण बसत है, सो बंशी गई चोरी काहे से गाऊँ प्यारी काहे से बजाऊँ, काहे से लाऊँ गैया घेरी मुखड़ा से गाओ कान्हा हाथ से बजाओ, लकुटी से लाओ गैया घेरी हा हा करत तेरी पइयाँ पड़त हूँ, तरस खाओ री प्यारी मोरी […]