Jab Jab Murli Knah Bajawat
मुरली मोहिनी जब जब मुरली कान्ह बजावत तब तब राधा नाम उचारत, बारम्बार रिझावत तुम रमनी, वे रमन तुम्हारे, वैसेहिं मोहि जनावत मुरली भई सौति जो माई, तेरी टहल करावत वह दासी, तुम्ह हरि अरधांगिनि, यह मेरे मन आवत ‘सूर’ प्रगट ताही सौं कहि कहि, तुम कौं श्याम बुलावत
Jabahi Ban Murli Stravan Padi
मुरली का जादू जबहिं बन मुरली स्रवन पड़ी भौंचक भई गोप-कन्या सब, काम धाम बिसरी कुल मर्जाद वेद की आज्ञा, नेकहुँ नाहिं डरी जो जिहि भाँति चली सो तेसेंहि, निसि में उमंग भरी सुत, पति-नेह, भवन-जन-संका, लज्जा नाहिं करी ‘सूरदास’ प्रभु मन हर लीन्हों, नागर नवल हरी
Jamuna Tat Dekhe Nand Nandan
गोपी का प्रेम जमुना तट देखे नंद-नन्दन मोर-मुकुट मकराकृति कुण्डल, पीत वसन, तन चन्दन लोचन तृप्त भए दरसन ते, उर की तपन बुझानी प्रेम मगन तब भई ग्वालिनी, सब तन दसा हिरानी कमल-नैन तट पे रहे ठाड़े, सकुचि मिली ब्रज-नारी ‘सूरदास’ प्रभु अंतरजामी, व्रत पूरन वपु धारी
Jasumati Palna Lal Jhulave
यशोदा का स्नेह जसुमति पलना लाल झुलावे, निरखि निरखि के मोद बढ़ावे चीते दृष्टि मन अति सचु पावे, भाल लपोल दिठोना लावे बार बार उर पास लगावे, नन्द उमंग भरे मन भावे नेति नेति निगम जेहि गावे, सो जसुमति पयपान करावे बड़भागी ब्रज ‘सूर’ कहावे, मैया अति हर्षित सुख पावे
Jasumati Man Abhilash Kare
माँ की अभिलाषा जसुमति मन अभिलाष करे कब मेरो लाल घुटुरूअन रैंगे, कब धरती पग धरै कब द्वै दाँत दूध के देखौ, कब तोतरे मुख वचन झरै कब नंद ही बाबा कहि बोले, कब जननी कहि मोहि ररै ‘सूरदास’ यही भाँति मैया , नित ही सोच विचार करै
Jasoda Hari Palne Jhulawe
पालना जसोदा हरि पालना झुलावै मेरे लाल की आउ निंदरिया, काहे न आन सुवावै तूँ काहैं नहि बेगिहि आवै, तोको कान्ह बुलावै कबहुँ पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै सौवत जानि मौन ह्वैके रहि, करि करि सैन बतावै जो सुख ‘सूर’ देव मुनि दुरलभ, सो नँद भामिनि पावें
Jagahu Jagahu Nand Kumar
प्रभाती जागहु जागहु नंद-कुमार रवि बहु चढ्यो रैन सब निघटी, उचटे सकल किवार ग्वाल-बाल सब खड़े द्वार पै, उठ मेरे प्रानअधार घर घर गोपी दही बिलोवै, कर कंकन झंकार साँझ दुहां तुम कह्यो गाईकौं, तामें होति अबार ‘सूरदास’ प्रभु उठे तुरत ही, लीला अगम अपार
Jagahu Lal Gwal Sab Terat
प्रभाती जागहु लाल ग्वाल सब टेरत कबहुँ पीत-पट डारि बदन पर, कबहुँ उघारि जननि तन हेरत सोवत में जागत मनमोहन, बात सुनत सब की अवसेरत बारम्बार जगावति माता, लोचन खोलि पलक पुनि गेरत पुनि कहि उठी जसोदा मैया, उठहु कान्ह रवि किरनि उजेरत ‘सूर’ स्याम हँसि चितै मातु-मुख, पट कर लै, पुनि-पुनि मुख फेरत
Ja Par Dinanath Dhare
हरि कृपा जा पर दीनानाथ ढरै सोइ कुलीन, बड़ो सुन्दर सोई, जा पर कृपा करै रंक सो कौन सुदामा हूँ ते, आप समान करै अधिक कुरूप कौन कुबिजा ते, हरि पति पाइ तरै अधम है कौन अजामिल हूँ ते, जम तहँ जात डरै ‘सूरदास’ भगवंत-भजन बिनु, फिरि फिरि जठर परै
Jewat Kanh Nand Ik Thore
भोजन माधुरी जेंवत कान्ह नन्द इक ठौरे कछुक खात लपटात दोउ कर, बाल केलि अति भोरे बरा कौर मेलत मुख भीतर, मिरिच दसन टकटौरे तीछन लगी नैन भरि आए, रोवत बाहर दौरे फूँकति बदन रोहिनी ठाड़ी, लिए लगाइ अँकोरे ‘सूर’ स्याम को मधुर कौर दे, कीन्हे तात निहोरे