Aaj Jo Harihi N Shastra Gahau

भीष्म प्रतिज्ञा आज जो हरिहिं न शस्त्र गहाऊँ तौं लाजौं गंगा-जननी को, सांतनु-सुत न कहाऊँ स्यंदन खंडि महारथ खंडौं, कपिध्वज सहित डुलाऊँ इती न करो सपथ मोहिं हरि की, क्षत्रिय-गतिहि न पाऊँ पांडव-दल सन्मुख हौं धाऊँ, सरिता रुधिर बहाऊँ ‘सूरदास’ रण-भूमि विजय बिनु, जियत न पीठ दिखाऊँ

Aaj Hari Adbhut Ras Rachayo

रास लीला आज हरि अद्भुत रास रचायो एक ही सुर सब मोहित कीन्हे, मुरली नाद सुनायो अचल चले, चल थकित भये सबम मुनि-जन ध्यान भुलायो चंचल पवन थक्यो नहि डोलत, जमुना उलटि बहायो थकित भयो चंद्रमा सहित मृग, सुधा-समुद्र बढ़ायो ‘सूर’ श्याम गोपिन सुखदायक, लायक दरस दिखायो

Aaju Meri Vrandawan Main

दधि लूटन आजु मेरी वृन्दावन में दधि लूटी कहाँ मेरो हार कहाँ नक बेसर, कहाँ मोतियन लर टूटी बरजो यशोदा श्यामसुंदर को, झपटत गगरी फूटी ‘सूरदास’ हेरि के जु मिलन को, सर्वस दे ग्वालिन छूटी

Aavat Mohan Dhenu Charay

गो-चारण आवत मोहन धेनु चराय मोर-मुकुट सिर, उर वनमाला, हाथ लकुटि, गो-रज लपटाय कटि कछनी, किंकिन-धुनि बाजत, चरन चलत नूपुर-रव लाय ग्वाल-मंडली मध्य स्यामघन, पीतवसन दामिनिहि लजाय गोप सखा आवत गुण गावत, मध्य स्याम हलधर छबि छाय सूरदास प्रभु असुर सँहारे, ब्रज आवत मन हरष बढ़ाय

Udho Mohi Braj Bisarat Nahi

ब्रज की याद ऊधौ, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं वृंदावन गोकुल की स्मृति, सघन तृनन की छाहीं प्रात समय माता जसुमति अरु नंद देखि सुख पावत मीठो दधि अरु माखन रोटी, अति हित साथ खवावत गोपी ग्वाल-बाल संग खेलत, सब दिन हँसत सिरात ‘सूरदास’ धनि धनि ब्रजबासी जिनसों हँसत ब्रजनाथ

Udho Karaman Ki Gati Nyari

कर्म की गति ऊधौ करमन की गति न्यारी सब नदियाँ जल भरि-भरि रहियाँ, सागर केहि विधि खारी उज्जवल पंख दिये बगुला को, कोयल केहि गुन कारी सुन्दर नयन मृगा को दीन्हें, वन वन फिरत उजारी मूरख को है राजा कीन्हों, पंडित फिरत भिखारी ‘सूर’ श्याम मिलने की आशा, छिन छिन बीतत भारी

Udho Hot Kaha Samjhaye

हरि की याद ऊधौ! होत कहा समुझाये चित्त चुभी वह साँवरी मूरति, जोग कहाँ तुम लाए पा लागौं कहियो हरिजू सों दरस देहु इक बेर ‘सूरदास’ प्रभु सों विनती करि यहै सुनैयो टेर

Kari Gopal Ki Hoi

प्रारु करी गोपाल की होई जो अपनौं पुरुषारथ मानत, अति झूठौ है सोई साधन, मंत्र, जंत्र, उद्यम, बल, ये सब डारौ धोई जो कछु लिखि राखी नँदनंदन, मेटि सकै नहिं कोई दुख-सुख लाभ-अलाभ समुझि तुम, कतहिं मरत हौ रोई ‘सूरदास’ स्वामी करुनामय, स्याम चरन मन पोई

Kaha Sukh Braj Ko So Sansar

ब्रज-महिमा कहाँ सुख ब्रज कौ सौ संसार कहाँ सुखद बंसी-वट जमुना, यह मन सदा विचार कहाँ बन धाम कहाँ राधा सँग, कहाँ संग ब्रज वाम कहाँ विरह सुख बिन गोपिन सँग, ‘सूर’ स्याम मन साम

Kaha Kahati Tu Mohi Ri Mai

मनोवेग कहा कहति तू मोहि री माई नंदनँदन मन हर लियो मेरौ, तब तै मोकों कछु न सुहाई अब लौं नहिं जानति मैं को ही, कब तैं तू मेरे ढ़िंग आई कहाँ गेह, कहँ मात पिता हैं, कहाँ सजन गुरुजन कहाँ भाई कैसी लाज कानि है कैसी, कहा कहती ह्वै ह्वै रिसहाई अब तौ ‘सूर’ […]