Aarti Lakshmi Narayan Ki
लक्ष्मीनारायण आरती आरती लक्ष्मीनारायण की स्वर्णिम पीताम्बर हरि धारे, उज्जवल वसन प्रिया चित चोरे माँ कमला कर धारे अम्बुज, कमल-नयन श्री विष्णु चतुर्भुज अनुपम कांति प्रिया पे राजै, श्रीपति क्षीर-समुद्र विराजै शंख चक्र अरु गदा पद्म कर, अनुपमेय शोभित हैं श्रीधर श्री पीठा-स्थित माता मोहे, शेष शयन गरुड़ासन सोहे मंजुल मूरति उज्जवल रूपा, सीता रूक्मिणि […]
Aarti Mangal Murati Ki
गणपति की आरती आरती मंगल मूरति की, गजानन सिद्धि विनायक की शीश पर स्वर्ण-मुकुट सोहे, हाथ में पाशांकुश राजे पीत पट कटि में लहराये, मुकुट पर चन्द्रकला साजे कण्ठ में लाल पुष्प माला, कान में कुण्डल झलकाये सदाशिव-गिरिजा के नन्दन, वदन की शोभा मन भाये गजानन कार्तिकेय भ्राता, भक्त के गणाधीश त्राता करो नित सेवा […]
Sarvatra Bramh Ki Satta Hi
ब्रह्ममय जगत् सर्वत्र ब्रह्म की सत्ता ही यह जगत् जीव के ही सदृश, है अंश ब्रह्म का बात यही माया विशिष्ट हो ब्रह्म जभी, तब वह ईश्वर कहलाता है ईश्वर, निमित्त व उपादान से दृश्य जगत् हो जाता है जिस भाँति बीज में अंकुर है, उस भाँति ब्रह्म में जग भी है सो जीव, सृष्टि, […]
Sakhi Ri Achraj Ki Yah Baat
अचरज की बात सखी री! अचरज की यह बात निर्गुण ब्रह्म सगुन ह्वै आयौ, बृजमें ताहि नचात पूरन-ब्रह्म अखिल भुवनेश्वर, गति जाकी अज्ञात ते बृज गोप-ग्वाल सँग खेलत, बन-बन धेनु चरात जाकूँ बेद नेति कहि गावैं, भेद न जान्यौ जात सो बृज गोप-बधुन्ह गृह नित ही, चोरी कर दधि खात शिव-ब्रह्मादि, देव, मुनि, नारद, जाकौ […]
Va Patpit Ki Fahrani
प्रतिज्ञा पालन वा पटपीत की फहरानि कर धरि चक्र चरन की धावनि, नहिं बिसरति वह बानि रथ तें उतरि अवनि आतुर ह्वै, कच रज की लपटानि मानौं सिंह सैल ते निकस्यौ, महामत्त गज जानि जिन गुपाल मेरो प्रन राख्यौ, मेटि वेद की कानि सोई ‘सूर’ सहाय हमारे, निकट भये हैं आनि
Suni Main Hari Aawan Ki
प्रतीक्षा सुनी मैं हरि आवन की अवाज महल चढ़ि चढ़ि देखूँ मोरी सजनी, कब आवे महाराज दादुर मोर पपीहा बोलै, कोयल मधुरे साज उमग्यो बदरा चहुँ दिस बरसे, दामिनि छोड़ी लाज धरती रूप नवा नवा धरिया, इंद्र मिलन के काज ‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, बेग मिलो महाराज
Sakhi Mharo Kanho Kaleje Ki Kor
प्राणनाथ कन्हैया सखी म्हारो कान्हो कलेजे की कोर मोर मुकुट पीतांबर सोहे, कुण्डल की झकझोर वृंदावन की कुञ्ज-गलिन में, नाचत नंदकिशोर ‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण-कँवल चितचोर
Main Hari Charanan Ki Dasi
हरि की दासी मैं हरि चरणन की दासी मलिन विषय रस त्यागे जग के, कृष्ण नाम रस प्यासी दुख अपमान कष्ट सब सहिया, लोग कहे कुलनासी आओ प्रीतम सुन्दर निरुपम, अंतर होत उदासी ‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, चैन, नींद सब नासी
Barse Badariya Sawan Ki
प्रतीक्षा बरसे बदरिया सावन की, सावन की मनभावन की सावन में उमग्यो मेरो मनवा, भनक सुनी हरि आवन की नन्हीं-नन्हीं बूँदन मेहा बरसे, शीतल पवन सुहावन की ‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, आनँद मंगल गावन की
Koi Kahiyo Re Prabhu Aawan Ki
विरह व्यथा कोई कहियौ रे प्रभु आवन की, आवन की मन भावन की आप न आवै, लिख नहिं भेजै, बान पड़ी ललचावन की ए दोऊ नैन कह्यो नहिं माने, नदियाँ बहे जैसे सावन की कहा करूँ कछु नहिं बस मेरो, पाँख नहीं उड़ जावन की ‘मीराँ’ के प्रभु कब रे मिलोगे, चेरी भई तेरे दामन […]