Dhani Dhani Vrindawan Var Dham

श्री वृन्दावन धाम धनि धनि वृन्दावन वर धाम भौतिकता तो नहीं जरा भी, जग प्रपंच को नहिं कछु काम श्यामा श्याम केलि थल अनुपम, नित नूतन क्रीड़ा अभिराम लाड़ लड़ावति लली लालकूँ, राग भोग तजि और न काम पालन सृजन प्रलय देवन को, काम करें अज हरि हर नाम नित्य किशोर किशोरी संग में, रचै […]

Dhuri Dhusrit Nil Kutil Kach Kare Kare

अन्तर्धान लीला धुरि धूसरित नील कुटिल कच, कारे कारे मुखपै बिथुरे मधुर लगें, मनकूँ अति प्यारे झोटा खात बुलाक, मोर को मुकुट मनोहर ऐसो वेष बनाइ जाउ जब, बन तुम गिरिधर तब पल-पल युग-युग सरिस, बीतत बिनु देखे तुम्हें अब निशिमहँ बन छाँड़ि तुम, छिपे छबीले छलि हमें

Nath Tav Charan Sharan Main Aayo

शरणागति नाथ तव चरण शरन में आयो अब तक भटक्यो भव सागर में, माया मोह भुलायो कर्म फलनि की भोगत भोगत, कईं योनिनि भटकायो पेट भयो कूकर सूकर सम, प्रभु-पद मन न लगायो भई न शान्ति, न हिय सुख पायो, जीवन व्यर्थ गँवायो ‘प्रभु’ परमेश्वर पतति उधारन, शरनागत अपनायो

Nek Thaharija Shyam Bat Ek Suni Ja Mori

राधा के श्याम नेंक ठहरि जा श्याम! बात एक सुनि जा मेरी दौर्यो जावै कहाँ, दीठि चंचल अति तोरी ब्रज में मच्यो चवाउ, बात फैली घर-घर में कीरति रानी लली धँसी है, तेरे उर में निज नयननि निरख्यो न कछु, सुन्यो सुनायो ही कह्यो गोरी भोरी छोहरी, को चेरो तू बनि गयो

Param Dham Saket Ayodhya

श्री अयोध्या धाम परम धाम साकेत अयोध्या, सुख सरसावनि हरन सकल सन्ताप, जगत के दुःख नसावनि सरयू को शुभ नीर, पीर सबई हरि लेवै हियकूँ शीतल करै अन्त में, प्रभु पद देवै करें धाम मँह बास जे, ते निश्चत तरि जायँगे कामी सब अघ मेंटि कें, धाम प्रभाव दिखायँगे

Bin Kaju Aaj Maharaj Laj Gai Meri

द्रोपदी का विलाप बिन काज आज महाराज लाज गई मेरी दुख हरो द्वारिकानाथ शरण मैं तेरी दुःशासन वंश कठोर, महा दुखदाई खैंचत वह मेरो चीर लाज नहिं आई अब भयो धर्म को नास, पाप रह्यो छाई यह देख सभा की ओर नारि बिलखाई शकुनि दुर्योधन, कर्ण खड़े खल घेरी दुख हरो द्वारिकानाथ शरण मैं तेरी […]

Van Te Aawat Shri Giridhari

वन से वापसी वनतैं आवत श्रीगिरिधारी सबहिं श्रवन दै सुनहु सहेली, बजी बाँसुरी प्यारी धेनु खुरनि की धुरि उड़त नभ, कोलाहल अति भारी गावत गीत ग्वाल सब मिलिकें, नाचत बीच बिहारी मलिन मुखी हम निशि सम नारी, बिनु हरि सदा दुखारी कृष्णचन्द्र ब्रजचन्द्र खिलें नभ, तब हम चन्द्र उजारी मिटै ताप संताप तबहिं जब, दृष्टि […]

Swamin Pashupate Prabho Das Ke Pas Chudao

शिवाशीव स्तुति स्वामिन्! पशुपति! प्रभो! दास के पास छुड़ाओ जगदम्बा! माँ! उमा वत्स कूँ हृदय लगाओ भटक्यो जग महँ जनक! शरन चरनन महँ दीजे माँ! अब गोद बिठाय चूमि मुख सुत कूँ लीजे यद्यपि हौं अति अधमहूँ, तऊ पिता! अपनाइ लैं मैं जो साधन रहित सुत, कूँ हिय तें चिपकाइ लैं  

Hari Ju Hamari Aur Niharo

शरणागति हरिजू! हमरी ओर निहारो भटकि रहे भव-जलनिधि माँही, पकरो हाथ हमारो मत्सर, मोह, क्रोध, लोभहु, मद, काम ग्राह ग्रसि डारो डूबन चाहत नहीं अवलम्बन, केवट कृष्ण निकारो बन पाषान परे इत उत हम, चरननि ठोकर मारो केवल किरपा प्रभु ही सहारो, नाथ न निज प्रन टारो  

Kahe Aise Bhaye Kathor

निहोरा काहे ऐसे भये कठोर टेरत टेरत भई वयस अब, तक्यो न मेरी ओर कहा करों, कोउ पंथ न दीखत, साधन भी नहिं और पै तुम बिनु मेरे मनमोहन, दीखत और न ठौर काहे अब स्वभाव निज भूले, करहुँ न करुना कोर हूँ मैं दीन भिखारी प्यारे, तुम उदार-सिरमौर