Vipin So Aawat Bhawan Kanhai
वन वापसी विपिन सों आवत भवन कन्हाई संग गोप गौअन की टोली और सुघड़ बल भाई गोधूली बेला अति पावन, ब्रज रज वदन सुहाई नील कमल पै जनु केसर की, सोहत अति सुखराई साँझ समय यह आवन हरि की, निरखहिं लोग लुगाई सो छबि निरखन को हमरे हूँ, नयना तरसहिं माई
Sakhi Lala Ke Mukh Pe Makkhan
माखन चोरी सखि लाला के मुँह पे मक्खन, मैंने जब लगा हुआ पाया भोलेपन से कुछ उत्तर दे, चित चुरा कन्हैया भाग गया जिनके घर अब तक नहीं पहुँचा, लाला मक्खन चोरी करने अति उत्कण्ठित वे गोपीजन, आ जाये वहीं उपकृत करने वास्तव में हर ग्वालिन का मन, अटका रहता है मोहन में वे उपालम्भ […]
Sakhi Ri Ati Natkhat Nandkishor
नटखट कन्हैया सखी री! अति नटखट नंद-किसोर करत छेड़खानी वह हमसों, सुनत न नैंकु निहोर मैया को अति लाड़-लड़ैतो, भयो बड़ो मुँहजोर घर में पैठि चुरावैं माखन, दैत मटुकिया फोर जमुना-तट जा चीर चुरावै, मग में घट दे तोर ऐसे कौतुक करत तदपि सखि, चलत न मन सों जोर चीर-छीर की कहा चलै इन, लियो […]
Sakhi Ri Main To Rangi Shyam Ke Rang
श्याम का रंग सखी री मैं तो रंगी श्याम के रंग पै अति होत विकल यह मनुआ, होत स्वप्न जब भंग हो नहिं काम-काज ही घर को, करहिं स्वजन सब तंग किन्तु करुँ क्या सहूँ सब सजनी, चढ्यो प्रेम को रंग आली, चढ़ी लाल की लाली, अँग-अँग छयो अनंग स्याममयी हो गई सखी मैं तो, […]
Saras Ras Hai Vrindavan Main
श्री वृन्दावन सरस रस है वृन्दावन में ग्यान ध्यान को मान न, रति-रस सरसत जन मन में राधे राधे-कहहिं लग्यौ मन, राधा जीवन में सबही को है सहज भाव, निजता को मोहन में ललन-लली की लाली ही तो, छाई कन कन में गोपी गोप मनहुँ प्रगटे नर-नारिन के तन में प्रिय को नित्य विहार प्रिया […]
Shyam Binu Bairin Rain Bhai
विरह व्यथा स्याम बिनु बैरिन रैन भई काटे कटत न घटत एक पल, सालत नित्य नई पल भर नींद नयन नहिं आये, तारे गिनत गई उलटि-पुलटि करवट लैं काटूँ, ऐसी दशा भई कहा बात मैं कहूँ गात की, जात न कछु कही अँखियन में पावस सी छाई, जब पल रूकत नहीं भये निठुर ऐसे नँदनंदन, […]
Hindole Jhulahi Naval Kishor
झूलना हिंडोले झूलहिं नवल-किसोर कहा कहों यह सुषमा सजनी! वारिय काम करोर वरन-वरन के वसन सखिन के, पवन चलत झकझोर सावन के मनभावन बादर, गड़गड़ाहिं घनघोर गावहिं सावन गीत मनोहर, भये जुगल रस भोर या रस के वश भये चराचर, जाको ओर न छोर
Are Man Kar Prabhu Par Vishvas
प्रभु का भरोसा अरे मन कर प्रभु पर विश्वास भटक रहा क्यों इधर-उधर तूँ, झूठे सुख की आस सुन्दर देह सुहावनि नारी, सब विधि भोग-विलास क्या पाया घरबार पुत्र से, मिटी न यम की त्रास क्षण-भङ्गुर सब भोग निरंतर, बने काल के ग्रास मिले परम सुख, घटे कभी नहिं, जिनके मन विश्वास
Aaju In Nayananhi Nirakhe
माधव की मोहिनी आजु इन नयनन्हि निरखे स्याम निकसे ह्वै मेरे मारग तैं, नव नटवर अभिराम मो तन देखि मधुर मुसकाने, मोहन-दृष्टि ललाम ताही छिनते भए तिनहिं के, तन-मन-मति-धन-धाम हौं बिनु मोल बिकी तिन चरनन्हि, रह्यौ न जग कछु काम माधव-पद-पंकज मैं पायौ, मन मधुकर विश्राम
Udho Kahan Sikhvo Yog
मोहन से योग ऊधौ! कहा सिखावौ जोग हमरो नित्य-जोग प्रियतम सौं, होय न पलक बियोग वे ही हमरे मन मति सर्वस, वे ही जीवन प्रान वे ही अंग-अंग में छाये, हमको इसका भान