हरिनाम स्मरण
अब तुम कब सुमरो गे राम, जिवड़ा दो दिन का मेहमान
गरभापन में हाथ जुड़ाया, निकल हुआ बेइमान
बालापन तो खेल गुमाया, तरूनापन में काम
बूढ़ेपन में काँपन लागा, निकल गया अरमान
झूठी काया झूठी माया, आखिर मौत निदान
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, क्यों करता अभिमान
बहोत धन्यवाद!
is sunder kavita ke lekhak kon hai